Sunday, May 21, 2017

संस्कृतं च संंगीतं च

संस्कृतं च संगीतं च
--- लीना मेहेंदळे
दि २१ मे २०१७

संस्कृत और संगीत दोनों ही विशिष्ट भारतीय शब्द है और उन दो विषयों को इंगित करते हैं जिनका आपस में घनिष्ठ संबंध है

मूल शब्द संस्कार से संस्कृत शब्द बना है संस्कार का अर्थ है ऐसी प्रक्रिया जिसमें सब कुछ अच्छा हो, सुफल हो प्रिय हो, गुणवान हो, सौंदर्यवान हो, नीतिवान हो ऐसी प्रक्रियाएँ अपने आप प्रकट नहीं होती वरन चिंतन के द्वारा उनकी अन्वेषणा की जाती है इस प्रकार चिंतन द्वारा संस्कार मनुष्य पर संस्कार ताकि उसका जीवन समाजोपयोगी हो, पशु व वृक्षों पर संस्कार ताकि वे दीर्घजीवी और आरोग्ययुक्त हो, इत्यादि हमारी परंपरामें आरंभसे ही है भाषा भी संस्कारित हुई तो संस्कृत बनी कभी-कभी एक उपालंभभरा वाद चलता है कि संस्कृत से प्राकृत भाषाएँ बनी या प्राकृत से संस्कृत दोनोंके पक्षमें तर्क दिए जा सकते हैं संस्कृत की प्राथमिकता के पक्ष में भी तर्क है हमारे सारे दर्शन, सारे ग्रंथ इस बात का इंगित करते हैं कि हमारे ऋषि मुनियोंमें सटीकता (exactitude) की परंपरा थी और क्यों न हो। जब सटीकता होती है तभी ज्ञान-वृद्धि की गति एवं व्याप्ति अतिशीघ्र हो सकती है इसी सटीकता के कारण कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे ऋषि-मुनियों की भाषा अतिप्राचीन कालसे ही संस्कारित रही हो।

सटीकता और संस्कृति की इतनी गहराई से चर्चा करनेका कारण है इस देशमें जो संगीत उपजा है उसमें भी वही संस्कार और वही सटीकता है, वही सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवेचन है यूं कहा जाए कि संस्कृत और संगीत दोनों ही प्रवृत्तियां एक जैसी ही हैं और एक दूसरे के पूरक भी इसी घनिष्ठ संबंधकी हम विस्तृत चर्चा करने जा रहे हैं

संस्कृत में भाषा की सटीकता के लिए कई संस्कार हुए जो हम प्रत्यक्षतः देख सकते हैं और सरलता से उसका आकलन भी कर सकते हैं हमारे व्याकरण की बातों को गौर से देखिए शब्दों के शब्दरूप, उनमें लिंग-भेद, वचन-भेद, द्विवचन का प्रयोग, काज्ञानके लिए क्रियाओंमें लकारों का प्रयोग, संधि व समास, तथा उपसर्ग और तद्धितादि प्रत्यय, बस इतनेसे ही व्याकरणके पाठ होते हैं लेकिन इनमेंसे प्रत्येक पाठ अपने आपमें विस्तृत है, नियमबद्ध है, और यही सुदृढता है जो संस्कृतकी सटीकताको संभाल कर रखती है

संस्कृतके व्याकरण शास्त्रके साथ ऋषि-मुनियों ने ध्वनि शास्त्र को भी समझा और उसका विस्तार से अध्ययन किया अनादि ब्रह्मांड में ध्वनि की उत्पत्तिसे ही सृजनका प्रारंभ हुआ इस रहस्यको हमारे ऋषियोंने अपने चिंतन द्वारा जाना। उन्हें तत्वचिंतन के साथ तत्वदर्शन भी हुआ तब उनकी पकड़में आया कि ध्वनि शास्त्र और शरीर शास्त्रके बीच साथ गहरा संबंध है। मनके भावोंके प्रकटीकरणके लिए चिंतनके स्तर पर चार सीढ़ियां हैं -- परा, पश्यंति, मध्यमा और वैखरी। परंतु शरीरके स्तरपर अक्षरो व नादका सृजन होता है शरीरके भिन्न भिन्न स्थानोंसे निकली अक्षर-ध्वनियां भिन्न भिन्न होती हैं

सी बात का आधार लेकर कुंडलिनी मार्गके चक्रों पर भिन्न-भिन्न अक्षरोकी उपस्थिति का दर्शन हमारे मनीषियोंने किया उस उस अक्षर के कंपन द्वारा उस उस चक्र को गुँजाने से जो अलग-अलग प्रभाव उत्पन्न होते हैं उनके अध्ययनसे मंत्र विद्याका जन्म हुआ इसी रहस्यसे गान विद्याका भी जन्म हुआ। वैखरी वाणीमें जो ध्वनि उच्चारण होता है उसके आधार पर वर्णमालाकी निश्चिती हुई और वर्गीकरण भी इस प्रकार ऋषियोंने सोलह स्वरों की अनुभूति की तत्पश्चात् व्यंजनोंमें भी कंठ वर्गके व्यंजन, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य और ओष्ठ वर्ण के व्यंजन इत्यादि वर्गीकरणसे हमारी वर्णमाला बनीका प्रचलन समस्त दक्षिण आशिया खंडके सभी देशोंमें रहा आज भी कोरियातक की भाषाओंमें, जैसे नेपाली, र्मी, था, भूटानी, तिब्बती, सिंहली आदि में भी यही वर्णमाला प्रचलित है

व्याकरणशास्त्र मंत्रशास्त्रके साथ साथ संस्कृतका छंदशास्त्र भी अत्यंत व्यापक है नाद, लय, ताल, छंद, आदि के उद्गाता स्वयं भगवान शिव ,हेये है इन्हीं के कारण सौंदर्यकी तथा ललित कलाओंकी सृष्टि होती हैयके साथ अपने आप ही गायन, वादन और नृत्य भी जुड़ जाते हैंका गहन संबंध मनोउर्जा के साथ है छंद शास्त्रके साथ-साथ संगीत गायनकलाका भी उदय और विस्तार हुआ

षियोंने प्रकृति के रहस्यों का वे लेते हुए जिन अगणित ऋचाओंका दर्शन किया उन्हें अगली पीढ़ियों तक पहुंचानेके हेतु गान-परंपरा एक सशक्त माध्यम बनी जनमानस के आकलन के लिए व्याकरण, ध्वनि-शास्त्र अथवा छंद-शास्त्र की अपेक्षा गायन विद्या अधिक सुगम एवं सरल सिद्ध हुई इसी कारण परा पश्यंती इत्यादि अवस्थाओंकी देवता जो वाग्देवी हैं, उनका मूर्त रूप सदैव वीणाके साथ ही होता है वीणा, डमरु एवं वेणु -- ऐसा माना जाता है कि सभी वादयों तथा संपूर्ण गायन कलाकी उत्पत्ति न्ही तीन वादयोंसे हुई है हमारे ग्रंथोंमें गान विद्यासे संबंधित गंधर्व-, सिद्ध-गण, यक्ष-गण तथा अप्सरा-गण इत्यादि गणोंका वर्णन है जिन्होंने गान कला का अध्ययन, विस्तार एवं प्रचार किया इनके प्रमुख अधिपतिके रूपमें गणपति प्रतिष्ठित हैं

ऋग्वेद आदि वेदोंको पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने के लिए श्रुति परंपरा चली उसमें अशुद्धता आनेका संकट था अशुद्ध मंत्रों से फलकी प्राप्ति नहीं हो सकती -- ठीक उसी प्रकार जैसे अव्यवस्थित रूप से की गई प्रक्रियाओंसे अच्छा उत्पादन नहीं निकल सकता अशुद्धताके संकटको टालनेके लिए एक अद्भुत तरीकेकी रचना हुई ऋचाओंमें उदात्त, अनुदात्त और स्वरित ध्वनियों के आचरण के रण उनकी गेयता बढी और मंत्र सामर्थ्य भी फिर उन ऋचाओंको पदोंमें विभक्त किया गया उनकी पाठ विधियां बनी जो सरलसे कठिन और कठिनसे कठिनतर होती गईं। इस प्रकार पदपाठ, क्रमपाठ, जटापाठ और घनपाठ का चलन प्रारंभ हुआ पदपामें हर पदको अपनी स्थितिनुसार गाया जाता है परंतु क्रमपामें दो पदोंको उलट फेर कर गाया जाता है जटापाठमें तीन पदोंको और घनपाठमें चार पदोंको उल्टा पुल्टा कर गाया जाता है इस शास्त्रके साथ ही किसी पडावपर सप्तसुरोंका भी प्रकटीकरण हुआ होगा ऐसी मेरी मान्यता है

हमारे ग्रंथ बताते हैं कि स्वरोंकी स्थितियोंको प्राणियोंके स्वरोंके साथ सिद्ध किया गया है कोकिलके स्वरसे पंचम, हाथीके स्वरसे धैवत और मयूरके स्वरसे निषाद सिद्ध होते हैं इसी प्रकार ऋषभ, गंधार और मध्यम भी सिद्ध होते हैं षड्ज की उत्पत्ति अन्य छः सुरोंसे से होती है इसलिए उसे षड्ज कहा गया है।

स्वरोंको कंठमें ध्रुवतासे स्थापित करने के लिए हर एक स्वरकी साधना आवश्यक है इसी प्रकार र, राग एवं सौंदर्य की उत्पत्ति के लिए उनका उलटफेर गायन भी कंठस्थित होना चाहिए इस उलटफेरका क्रम भी दो स्वर, तीन स्वर और चार स्वरों के साथ उसी प्रकार गाया जाता है जैसी वेदोंके पदोंकी उलटफेर करनेकी पद्धति है जैसे पदपाठ, क्रमपाठ, जटापाठ और घनपाठ की सिद्धता होती है उसी प्रकार सप्तसुरोंकी आलाप एवं तानकी विधियाँ हैं। 

अतएव कहा जा सकता है कि हमारे मनीषियोंने पूरी तरह सोच विचार कर ही गानसाधना और ज्ञानसाधनाको एक दूसरेका पूरक पाया, उनकी एकत्रित उपासना की विधियां नियुक्ति कीं। उनका स्मरण, उनका अभ्यास, अभिव्यक्ति और अनुभूति एक साथ गुथे हुए हैं। जहाँ वेदोंमें निहित ज्ञानसाधना मानवको मोक्ष तक ले जाती है, वहीं संगीत-साधना भी समाधि-दर्शनकी अनुभूति दे जाती है। इस प्रकारसे भारतकी संस्कृति, भारत की संस्कृतोद्भव भाषाएं तथा भारतीय संगीतका एक अभिन्न नाता है, जिसका सही-सही आकलन हमने शायद अभी तक नहीं किया है हमारा सेमिनार इस दिशा में आगे भी कार्यरत रहे, शोधप्रवर्तक बने और सफल होता चले यही शुभकामना

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Tuesday, May 16, 2017

२०१७ -- फर्गसन कॉलेज व परमहंसनगर

कौशलम् चे लेटरहेड
दि. ०३-०५-२०१७  
 प्रति,
माननीय डॉ. श्रध्दा प्रभुणे-पाठक
(नगरसेविका,प्रभाग क्र-१०)
                   विषय- शालेय विद्यार्थ्यांसाठी मराठी टायपिंग शिकविण्याबाबत.

महोदया,
    २०१७ च्या निवडणुकीमध्ये आपण नगरसेवक पदी निवडून आल्याबद्दल प्रथमतः आपले मनपूर्वक आभिनंदन.
          कौशलम् न्यासच्या प्रमुख संरक्षिका, श्रीमती लीना मेहेंदळे यांच्या चर्चेच्या अनुषंगाने हे पत्र कौशलम् न्यासाच्या वतीने पाठवीत आहे. कौशलम् न्यासाच्या उद्दिष्टांमध्ये संस्कृत व प्रादेशिक भाषांचे संवर्धन हे प्रमुख उद्दिष्ट आहे व त्यासाठी संगणकावर भारतीय भाषांना सरसकट एकसारखेपणाने लागू होणारा इन्स्क्रिप्ट किबोर्ड प्रचारात आणण्यासाठी कार्यक्रम घेतले जातात. या उपक्रमाची गरज विद्यालयांमध्ये देखील आहे कारण या कौशल्यशिक्षणाचा उपयोग विद्यार्थ्यांना त्यांच्या पुढील जीवनामध्ये निश्चितपणे  होऊ शकतो.
    कौशलम् ट्रस्ट व आपल्या सहयोगाने असे उपक्रम घेतले जाऊ शकतात. आपल्या विभागातील महानगरपालिकेच्या दोन शाळांमध्ये प्रथम हा उपक्रम घेतला जावा, असा आमचा प्रस्ताव आहेहा उपक्रम १२ दिवसांचा (२ आठवडे) असेल सोमवार ते शनिवार या दिवसांत दररोज १ तासाचा कालावधीचा असेल. हा उपक्रम गरजेचा आहे हे आपणास संलग्न टिप्पणी वरून पटेल. सविस्तर चर्चा करण्यासाठी आम्ही आपणांस भेटू इच्छितो.
कळावे ही विनंती,
धन्यवाद,
 कौशलम् ट्रस्ट.
१) प्राची लुष्टे
२) अमित मोकर
(फोन.नं. ०२०-२५३८३४७२) 

टिपणी संलग्न.
टिपणी:

विद्यालयामध्ये सुलभ मराठी टंकलेखनाबाबत जाणीव व जागृती निर्माण करणेः-

            मराठी विद्यालयामध्ये पुष्कळसा लेखी व्यवहार हा मराठीतूनच होतो. त्यामूळे संगणक हा विद्यालयीन कामासाठी वापरायचा झाला तर शक्य असेल त्या सर्वांना  संगणकावर मराठी लिहीता यायला हवे. खासकरून शाळेतील विद्यार्थ्यांसाठी संगणकावर मराठी टायपिंग शिकण्याची उपयुक्तता फार आहेसंगणकात यासाठी काय सोय आहे ते समजून त्यांना हे शिकता येऊ शकेल
            इंग्रजी कि-बोर्ड हा टाईपरायटर व संगणकामध्ये एकसारखाच असतो. जरी तो लक्षात ठेवायला थोडा अवघड असला तरी संगणकावर तोच असल्यामूळे तो की-बोर्ड लक्षात ठेवण्यावाचून पर्याय नसतो. परंतू मराठी टंकलेखनाची माहिती मराठी शाळेतील शिक्षकांना फारशी असत नाही.
            संगणकावरील मराठी टंकन करण्यासाठी इन्स्क्रिप्ट मराठी टंकलेखन हा सरळ व सोप्या पद्धतीचा पर्याय आहेते शिक्षण शालेय मुलांना द्यावे. आम्ही प्रस्तवित केलेल्या उपक्रमाचा उद्देश सरळ व सोप्या पद्धतीचे इन्स्क्रिप्ट मराठी टंकलेखन हे आपल्या विद्यार्थ्याना कसे अवगत करता येईल असा आहे.
सोपा का ?
            यामध्ये मराठी वर्णमालेनुसार की-बोर्डची मांडणी केली आहे. त्यामुळे की-बोर्डवरील मराठी अक्षरांचे क्रम लक्षात ठेवण्यची कटकट संपते व अतिशय सोप्या पद्धतीने लोकांना इंग्रजी की-बोर्ड माहीती नसताना ही मराठी टंकनलेखन अवगत करता येते.
            या टंकलेखनाचे वैशिष्ठ्य म्हणजे डाव्या बाजूला स्वर, काना, मात्रा तर उजव्या बाजूला सर्व व्यंजने आहेत. त्यामूळे एका-आड एक दोन्ही हाताच्या चार-चार अशा आठही बोटांनी टंकनलेखन केले जाऊन, टंकलेखनाचा वेग वाढवण्यास देखील मदत होते.
उपक्रमाचे स्वरूपः-
·                    हा उपक्रम १२ दिवसांचा (२ आठवडे) असेल.
·                    सोमवार ते शनिवार या दिवसांत दररोज १ तासाचा कालावधीचा असेल.
·                    शाळेमध्ये किमान ५ संगणक असणे गरजेचे आहे,
·                    ३ विद्यार्थ्यांसाठी एक संगणक असेल,
·                    अशा प्रकारे एका बँच मध्ये किमान १५ विद्यार्थी असतील.
·                     संगणक संख्या कमी असल्यास दोन बँच घेतल्या जावू शकतात.
·                    कोशलम् न्यासाच्या वतीने दोन प्रशिक्षक काम करतील.

 अशा प्रकारे उपक्रमाचे स्वरूप असेल
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कौशलम् चे लेटरहेड
या पत्राची प्रत जयंत सहस्रबुद्धे (विज्ञान भारती) यांना ईमेल केली
 दिनांक-०५-०५-२०१७
प्रति,
मा. मुकुंद देशपांडे
संयोजक- भारतीय विज्ञान संमेलन, Expo,
 पुणे-४११००४
            विषयः- मराठी टायपिंग शिकविण्याच्या सोप्या पद्धतीचे प्रात्यक्षिक यासाठी स्टॉल मिळण्याबाबत.
महोदय,
    कौशलम् न्यासच्या प्रमुख संरक्षिका, श्रीमती लीना मेहेंदळे व प्रा. विनय चाटी यांच्यात चर्चा झाली असता. या चर्चेच्या आधारे आम्ही आपल्या बरोबर ०४-०५-२०१७ रोजी भेट घेतली.
   भेटीच्या अनुषंगाने हे पत्र कौशलम् न्यासाच्या वतीने पाठवीत आहे. कौशलम् न्यासाच्या उद्दिष्टांमध्ये संस्कृत व प्रादेशिक भाषांचे संवर्धन हे प्रमुख उद्दिष्ट आहे व त्यासाठी संगणकावर भारतीय भाषांना सरसकट एकसारखेपणाने लागू होणारा इन्स्क्रिप्ट किबोर्ड प्रचारात आणण्यासाठी कार्यक्रम घेतले जातात. या उपक्रमाची गरज महाविद्यालयांमध्ये देखील आहे कारण या कौशल्यशिक्षणाचा उपयोग विद्यार्थ्यांना त्यांच्या पुढील जीवनामध्ये निश्चितपणे होऊ शकतो. तसेच Expo ला भेट देणारे सामान्य लोक, ही पद्धत ५ ते ६ मिनिटात सुद्धा शिकू शकतात. त्यामुळे याला महत्वप्राप्त झाले आहे.
     मराठी टायपिंग शिकविण्याची इनस्क्रिप्ट ही एक सोपी पद्धत असल्याने ही पद्धत सर्वांना अवगत होण्यासाठी कौशलम् ट्रस्ट कार्यरत असते. कौशलम् ट्रस्ट च्या द्वांरे अशा प्रकारचे अनेक उपक्रम हाती घेतले जातात. आपल्या महाविद्यालयात आयोजित केलेल्या कार्यक्रमामध्ये आम्ही मराठी टायपिंग प्रात्यक्षिकासाठी स्टॉल लावू इश्चितो. स्टॉल लावण्या संदर्भात काही अटी व नियम असतील ते आपण आम्हाला कळवावे.
कळावे हि विनंती,
धन्यवाद,

कौशलम् ट्रस्ट.
) प्राची लुष्टे
) अमित मोकर
(फोन.नं.०२०-२५३८३४७२)
sp;    संगणक संख्या कमी असल्यास दोन बँच घेतल्या जावू शकतात.

·                    कोशलम् न्यासाच्या वतीने दोन प्रशिक्षक काम करतील.
  अशा प्रकारे उपक्रमाचे स्वरूप असेल
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Thursday, May 4, 2017

चेत जाइये वरना युनीकोड बनेगा हमारी एकात्मिक सांस्कृतिक धरोहर को खतरा

चेत जाइये वरना युनीकोड बनेगा हमारी एकात्मिक सांस्कृतिक धरोहर को खतरा

आधुनिक जगतमें संगणकोंने एक अभूतपूर्व क्रांति पैदा की है। ज्ञान, वैज्ञानिकता और प्रगती के हर शिखर के लिय़े प्रयुक्त हर सीढीमें संगणक-तंत्र अत्यावश्यक है। भाषाई विकास भी इसके बिना असंभव है – यह बोध तो कई चिन्तकोंमें आ गया है परन्तु संगणक-लेखन में प्रमाणीकरण एवं समन्वय दोनोंके अभावमें साथही कुछ लापरलाहीसे भारतीय भाषाओंकी समग्र एकात्मता और सांस्कृतिक एकतापर जो बडा संकट मंडरा रहा है उसकी ओर अभीतक किसीने ध्यान नही दिया है।

इस खतरेको दो हिस्सोंमें समझना होगा। पहलेका कारण यह था कि अपार लगन, वैज्ञानिक श्रेष्ठता, और संसाधनोंकी बहुलताके संबलपर जिन्होंने भारतीय भाषाओंके लिये सॉफ्टवेअर बनाये उन्होंने दो आवश्यक कामोंमेंसे एक किया और दूसरेको स्वार्थवश अधूरा छोड रखा। अब भारतीय बाजारका लाभ लेनेके लिये जागतिक युनीकोड कन्सॉर्शियमने ने दूसरा काम तो कर दिया पर पहले कामकी कुछ अच्छाइयोंको बिगाडकर। दोनोंही तरफसे नुकसान है हमारी भाषाका, सांस्कृतिक विरासतका और एकात्मताका।

इसे हम यों समझ सकते हैं कि विश्वमें भाषाएँ और लिपियाँ कई हैं लेकिन वर्णमालाएँ केवल चार है ---
(1) ब्राह्मी – जिससे देवनागरी (संस्कृत), अन्य सारी भारतीय लिपियाँ, साथही सिंहली, थाई, तिब्बती, इंडोनेशियन और मलेशियन लिपियाँ बनीं।
(2) चीनी – जिससे चीनी, जपानी एवं कोरियाई लिपियाँ बनीं।
(3) फारसी – जिससे फारसी, अरेबिक एवं ऊर्दू लिपियाँ बनीं।
(4) ग्रीक, लैटिन रोमन व सिरिलीक – जिनमें आपसमें थोडासा अन्तर है और जिनसे तमाम पश्चिमी एवं पूर्वी युरोपीय लिपियाँ बनीं।

प्रत्येक वर्णमालामें अक्षरोंका वर्णक्रम सुनिश्चित है। भारतकी सभी भाषाओंका वर्णक्रम एक ही है जिसका ढाँचा ध्वन्यात्मक है। यदि इस विशेषताको टिकाये रखकर तथा उसका लाभ उठाते हुए हमने संगणकीय लिपी-प्रमाणक बनाये और उन्हें अनिवार्य घोषित कर पायें तो हमारी सांस्कृतिक एकात्मताकी अंतर्निहित शक्ति एवं वैज्ञानिकताके कारण हम लम्बी छलाँग लगा सकते हैं अन्यथा इसको नजरअंदाज कर हम अपनी एकात्मिक सांस्कृतिक धरोहरको एक झटकेसे गँवा भी सकते हैं। आज हम दूसरे खतरेके बगलमें खडे हैं जिसके प्रति हमें शीघ्रतासे चेतना होगा।

पर पहले देखें कि आज संगणक पर भारतीय भाषाएँ कहाँ हैं। अपने संगणकपर जाकरयह  रिजनल ऍण्डà कण्ट्रोल पॅनल à सेटिंग àसिक्वेन्स टिकटिकाएँ – स्टार्ट  àलॅन्गवेज
तो आपको एक ड्रॉप-डाउन मेनू दिखेगा जिसपर बाय डिफॉल्ट लिखा होगा EN अर्थात् इंग्लिश. उसके पूरे मेनूमें देखनेपर आपको भारतीय भाषाओंके सिवा हर भाषाका ऑप्शन दिखेगा – फ्रेंच, अरेबिक, चायनीज, स्वाहिली, थाई, रशियन, सिरीलिक, कोरियाई,....। यह हालत तब है जब विश्वकी सर्वाधिक बोली जानेवाली बीस भाषाओंकी गिनतीमें पाँच भारतीय भाषाएँ हैं -- हिन्दी, बंगाली, मराठी, तेलगू और तमिल। फिर भी भारत की किसी भाषा को वहाँ स्थान न मिलने का कारण क्या हो सकता है ? जरा सोचें – यह कारण है हमारी अकर्मण्यता, अदूरदर्शिता, स्वार्थ, अहंकार और न जाने क्या क्या। तो उन्हें परे ठेलकर भारतीय भाषाओंको वहाँ प्रस्थापित करनेका बीडा उठा सके ऐसा कौन होगा?
पहले खतरेको विस्तारसे समझना
अब देखते हैं इस दुर्घटनाका इतिहास अर्थात् पहले खतरेको विस्तारसे समझना। पहले हम समझें कि लेखन-प्रक्रिया के तीन मीलके पत्थर अर्थात् कागज-कलम, टाईप-रायटर और संगणक में क्या अंतर हैं। जब हम कलमसे कगजपर लिखते हैं, तो मनमें जैसेही एक शब्द उभरता है, उसी समय मनके पटलपर उसका एक दृश्य-स्वरूप भी उभरता है और वही दृश्य-स्वरूप हाथसे कागजपर लिखा जाता है। जब टाइपरायटर बने तो हमने दो बातोंको अलग-अलग पहचानना सीखा – कि दृश्य-स्वरूप क्या होगा और निर्दश-तंत्र (अर्थात् किस अक्षरके लिये किस कुंजीको दबाना है) क्या होगा। निर्दश-तंत्रकी उपयोगिताके लिये कुंजीपटलके प्रमाणीकरणकी आवश्यकता भी अनिवार्य़ हुई। जब संगणक आया तो उसमें निर्देश-तंत्र और दृश्य-स्वरूप के बीचमें एक और कडी जुड गई जो संग्रह-व्यवस्था की कडी है। अतः यह जरूरी हो जाता है कि हम इस संग्रह-व्यवस्थाको समझें और उसका भी प्रमाणीकरण करें।

यदि हम समझ लें कि संगणककी प्रोसेसर चिप उसके लिये एक मस्तिष्क का काम करती है (जो कि मानवी मस्तिष्कसे हजारोंगुना अविकसित है पर है तो मस्तिष्क ही) तो संगणकके कामको समझना सरल है। उसकी संग्रह-व्यवस्थामें एक भारी मर्यादा है क्योंकि उसका मस्तिष्क अविकसित है। वह हमारी तरह शून्यसे नौ तककी दस इकाइयाँ नही समझता – केवल दो इकाइयाँ समझता है – शून्य एवं एक । तो उसे मानवी भाषा समझानेके लिये हम प्रत्येक अक्षरके लिये आठ-आठ इकाइयोंकी शृंखला बनाते हैं। ऐसे 256 पॅटर्न या अक्षर-शृंखला बन सकते हैं और संगणक अपने अपार क्षमतावाले स्मृति-संग्राहक यानी हार्ड-डिस्कमें उन्हे आठ-आठ इकाइयोंकी शृंखलाके रूपमेंही संग्रहित कर लेता है। अतः इन शृंखलाओंकाभी प्रमाणीकरण अवश्यक है।

इस प्रकार लेखनके विकासके इतिहासमें सैंकडों वर्ष पूर्व दृश्य-स्वरूपका एवं वर्णक्रमका प्रमाणीकरण हुआ। प्रिंटिंग तकनीकका विकास हुआ तब वर्णविन्यास अर्थात् फॉण्टसेटोंका प्रमाणीकरण हुआ, यथा अंग्रेजी के एरियल, टाइम्स न्यू रोमन, कूरियर इत्यादी फॉण्ट, जिनसे दृश्य-लेखनकी सुंदरता एवं विविधता बढती है और फॉण्टफटीग नही पैदा होता। टाइपरायटरोंके कारण निर्देश-तंत्रका अर्थात् कुंजीपटलका प्रमाणीकरण हुआ। हमारा परिचित अंग्रेजी कुंजीपटल क्वर्टी नामसे जाना जाता है क्योंकि उसकी पहली पंक्तिके पहले अक्षर q,w,e,r,t,y (क्वर्टी) क्रमसे आते हैं। इस निर्देश-तंत्रमें रोमन वर्णमाला के परिचित क्रम से भिन्न क्रम रखना पडा ताकि कुंजीकी कडियाँ एकदूसरे में ना फँसे। इस प्रकार मशीनकी सीमा के कारण नया क्रम बनानेकी आवश्यकता आन पडी। इसी प्रकार संगणकके आनेपर आरंभमें कई कंपनियोंने अंग्रेजी वर्णाक्षरोंके लिये अलग अलग निर्देश-समूह बनाये। लेकिन जब यह समझमें आया कि इस कारण लेखन-तंत्रकी एकवाक्यता एवं आदान-प्रदान को खतरा है तो अपने अपने निर्देश-समूहोंको भुलाकर सबने अंग्रेजीके लिये एक स्टॅण्डर्ड अपनाया जिसका नाम था ASCII ।

जब भारतीय लिपियोंके लिये संगणकपर सॉफ्टवेअर बनने लगे तो एक ओर प्राइवेट कंपनियाँ अलग-अलग प्रकारसे सुंदर फॉण्ट, निर्देश-तंत्र और संग्रह-तंत्र बनाने लगीं तो दूसरी ओर भारत सरकारने इनके प्रमाणीकरणके लिये कदम उठाये। 1991 में ISCII नामसे एक प्रमाणक (मानक - स्टॅण्डर्ड) बन भी गया जिसे बनानेमें सरकारी संगणक-कंपनी सी-डॅकका योगदान रहा। इसमें मानकमें कई अच्छाइयाँ थीं।

एक तो इसमें सभी भारतीय भाषाओंको एक सूत्रमें पिरोया गया था। भाषा मल्याली हो या बंगाली -- एक अक्षऱका संग्रह-तंत्र एक ही और निर्देश-तंत्र भी एक ही हो ऐसी व्यवस्था रखी गई। दूसरी अच्छाई यह थी कि निर्देश-तंत्र अर्थात कुंजीपटलके लिये इन्स्क्रिप्ट नामसे एक क्रम लागू किया जो वर्णाक्षरोंके क्रमानुसार था ताकि स्कूलकी पहली कक्षामें पढाये गये वर्णक्रमसे काम हो सके। तीसरी अच्छाई यह थी कि एक लिपीमें कुछ भी लिखो तो उसे मात्र एक इशारेसे अन्य लिपीमें लिप्यंतरित किया जा सकता था। यह तीनों अच्छाईयाँ अलीबाबा के खुल जा सिमसिमकी तरह थी क्योंकि इसी एकात्मताके कारण आनेवाले कालमें इस बातकी संभावना बन सकती थी कि एक भाषामें महाजालपर डाली गई सामग्रीकी जानकारी दूसरी भाषा में सर्च करनेपर भी मिल जाय। यहाँ यह याद दिला दूँ कि यद्यपि सामान्यजनके काम लायक महाजाल-सुविधा 1995 में आई फिर भी सीमित रूपमें यह पहले भी उपलब्ध थी और इसकी संभावनाओंको हमारे मानक-शास्त्रज्ञ जानते थे। इसी कारण उन्होंने एकात्म सर्च सुविधाका विचार कर मानक बनाया था।

लेकिन इस एक अच्छे कामके बाद सी-डॅककी नियत बदल गई। स्टॅण्डर्डके हिसाबसे सॉफ्टवेअर बनानेसे वह अगले आविष्कार व सॉफ्टवेअरोंके लिये उपयोगी सिद्ध होता -- फिर अलग-अलग प्रतिभावाले लोग उससे और भी अगला काम करते और भाषा-विकासमें बडी सहायता मिलती। इसके बजाय सी-डॅकने अपनी उपलब्धिसे आर्थिक कमाईकी नीति अपनाई। स्टॅण्डर्डकी अवधारणाको धता बताकर गोपनीय संग्रह-तंत्र बनाया और दूसरी सॉफ्टवेअर कंपनियोंके साथ स्पर्धा बनाने में जुट गई। फिर सरकारभी किसीपर सख्तीसे स्टॅण्डर्ड नही लागू कर पाई। सभीने अपने भाषाई सॉफ्टवेअर ऊँचे दामोंमें बेचे। 1990-95 में जब अंग्रेजी गद्य-लेखनका सॉफ्टवेअर 500 रुपयेमें दिया जाता वहीं भाषाई सॉफ्टवेअरकी कीमत 15000 रुपये होती थी (आज भी है)। इस प्रकार बाजारके गणितने भाषा-विकासको पीछे धकेल दिया। राजभाषाकी हमारी सारी दुहाइयाँ नाकाम रहीं क्योंकि दुहाई देनेवालोंने कभी तंत्रको समझनेमें कोई रुचि नही दिखाई।

यह मानना पडेगा कि भाषाई सॉफ्टवेअरोंका विकास कोई सरल काम नही था और भाषाई सॉफ्टवेअर बनानेवालोंके कारण ही देशमें संगणक-साक्षरता ऐसी बढी कि यूरोप-अमरीकाका काम आउटसोर्स होकर देशमें आने लगा औऱ IT industry ने अपना सुदृढ स्थान बना लिया। यह ऐसा मामला था कि जैसे कोई हमेशा झीरो अंक पानेवाला बच्चा पंद्रह अंक ले आये। खुशियाँ मनने लगीं और हम भूल गये कि कामकी जो अच्छी शुरुआत हुई उससे तो हमारी सौ अंक लानेकी क्षमता बनती थी।

स्टॅण्डर्ड लागू न करनेके तीन दूरगामी विपरीत परिणाम हुए। पहला --- दो संगणकोंके बीच आदान-प्रदान नही रहा। एकके कामसे दूसरे कई लाभान्वित होते रहें तो शीघ्रतासे तरक्की होती है। वह मौका चूक गया। दूसरा – भाषाप्रेम चाहे लाख हो, फिर भी इतना महँगा सॉफ्टवेअर खरीदना सबके लिये संभव न था, खासकर जब उसका काम दूसरे संगणकपर चल ही न सके। तीसरा – जब 1995 में ईमेल व्यवहार जनसामान्यके स्तर पर आ गया तो पता चला कि गोपनीय सोर्सकोड के कारण भारतीय भाषाकी कोई फाइल चित्ररूपमें ढाले बगैर महाजालपर (इंटरनेटपर) नही डाली जा सकती। यही कारण है कि किसी संगणक के रिजनल ऍण्ड लॅन्गवेज सेटिंगमें भारतीय भाषा नही दिखती। इस प्रकार ढुलमुल रवैयैके कारण भारतीय जनता सारी उपलब्धियोंसे वंचित रही।

भारतीय भाषाई सॉफ्टवेअर कंपनियोंकी स्पर्धा, स्वार्थके लिये समन्वयको ताकपर रखनेकी सोच और सरकारी कंपनीका भी उसी स्वार्थमें लिपटना इन तीनोंके सम्मुख बाकी देश और प्रशासन इस कदर हतबल है कि 1995 के बाद आजतक स्थितिमें कोई अंतर नही। इसी कारण यह भ्रम भी खूब फैला और बरकरार रहा कि संगणकपर काम करनेके लिये अंग्रेजी अनिवार्य है। महाराष्ट्र जैसे प्रगत और मराठी-अस्मिताकी दुहाईवाले प्रांतमें भी सरकारने कॉलेजोंमें मराठी के विरुद्ध IT का ऑप्शन मुहैया कराया, अंग्रेजी की अनिवार्यता पहली कक्षासे ही लागू हो गई और मराठीका नुकसान अरंभ हुआ जो अब भी चल रहा है।


यदि सभी कंपनियोंके सॉफ्टवेअरमें संग्रह-तंत्रका कॅरॅक्टर-कोड एकही प्रमाणकके अनुसार रखा जाता तो सामान्य व्यक्तिको लाभ होता। साथही मायक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियाँ जो भारतियोंकी आपसी फूट पर चटखारे ले-लेकर पलती हैं,  उनपर दबाब बनाया जा सकता था कि वे इसी प्रमाणकको अपनी ऑपरेटिंग सिस्टम का हिस्सा बनायें। ऐसा कुछ भी नही हुआ। जागतिक स्तरपर भारतियोंकी छवि उभरी कि ना ही इनमें दूरगामी चिंतन है,  ना एकता, ना अपनी भाषाओंके लिये अड जानेकी दृढता। एक चित्र और भी उभरा – कि भारतीय जनताके करोडों रुपयोंपर पलनेवाली सरकारी कंपनी सी-डॅक भारतीय भाषाओंके लिये कुछ नही कर रही थी बल्कि अंग्रेजी की तुलनामें उन्हे पीछे धकेल रही थी। इसका उदाहरण यह है कि तमाम भाषाओंकी एकता और प्रगति बढानेकी क्षमतावाला एक सॉफ्टवेअर बनाया लीप-ऑफिस जिसका वर्णक्रम तो इन्स्क्रिप्ट था लेकिन उसका सोर्सकोड मानकके मुताबिक और खुला (ओपन) करनेके बजाए उसे मोनोपोलीवाला और अतीव महँगा रखा। 1993-97 के दौरान उसका एक अंश लीप-लाइट के नामसे  फ्री-डाउनलोड के लिये मुहैया कराया जो केवल एक पन्नेके कामके लिये सीमित था। फिर भी उसमें इन्स्क्रिप्टकी सरलता एवं cut, copy, paste व print की सुविधाके कारण वह उपयोगी था। लेकिन 1998 में cut, copy, paste print की सुविधा हटाकर लीपलाईटको निरर्थक बनाया और एक दूसरे सॉफ्टवेअरकी लाखों सीडी मुफ्त बाँटी जिसका फलसफा था कि आप अंग्रेजीमें लिखो और अपनी भाषामें देखो। अर्थात् मुझे अपना नाम लीना लिखने के लिये उसका अंग्रेजी हिज्जे जानना होगा और अंग्रेजी टायपिंग भी सीखनी होगी। फिर मैं लिखूँगी Leena  और संगणकपटल पर लीना देखकर धन्य हो जाऊगी। मैं कई वर्षोंतक उन्हे समझाती रही कि भैये, कमसेकम पहली सुविधा तो रहने दो, वह दूसरीके आडे नही आती। पर वे नही माने। उनके साथ कई दिग्गज भी कहने लगे कि जब आप अंग्रेजीके माध्यमसे लिख सकते हैं तो अपनी लिपीका दुराग्रह क्यों?  फिर 2009 में मेरे अतीव आग्रह पर वही लीपलाईटकी आंशिक सुविधा फिरसे दे दी लेकिन केवल मराठी भाषा के लिये। इसका उल्लेख उनके होमपेजपर है, न कोई गॅरंटी कि सुविधा कबतक रहेगी और न कोई चर्चा कि यह सुविधा अन्य भाषाओंमें क्यों नही। साथही पहले इसमें जो तत्काल लिप्यंतरणकी सुविधा थी वह गायब है। पहले मेरे कई आसामी मित्रोंने ऐसा किया है कि मैं कोई संस्कृत श्लोक और उसका विवेचन हिंदीमें लिखूँ तो उसका आसामी लिप्यंतरण विद्यार्थियोंको देंगे जिससे वे संस्कृत भी सीखेंगे और हिंदी भी। मैंने स्वयं भी इसी पद्धतीसे सारी लिपियाँ भी सीखीं और कइयोंको हिंदी व मराठी सिखाई। अब वह एकात्मता और अपनापन बढानेवाला दौर समाप्त हो जायगा। यह मैं एक बडा खतरा मानती हूँ।

इस प्रकार पहले खतरेको हमने यों समझा कि यद्यपि सीडॅकने एक अच्छा सॉफ्टवेअर विकसित किया फिर भी उसे प्रमाणकके अनुरूप नही रखा और सोर्सकोड गोपनीय रखा, बाजारकी स्पर्धामें कूद पडे, अतएव उनके पास भाषाई एकात्मता सँजोनेवाला सॉफ्टवेअर होते हुए भी न वह महाजाल-व्यवहार के लिये उपयुक्त रहा और न अन्य भारतियोंकी प्रतिभाको बढावा देनेके लिये उसका कोई उपयोग हो पाया।

अब समझने चलते हैं दूसरे खतरेको
संगणककी प्रोसेसर चिपोंमें अधिक क्षमता निर्माण हुई तो उनपर आठ इकाइयोंवाली अक्षरशृंखला की जगह सोलह इकाइयोंवाली अक्षरशृंखला बनाना संभव हुआ । इससे बडी वर्णमालाओंको सम्मिलित करने के लिये कई गुना अधिक जगह बन गई। चीनी और फारसी लिपियोंके अच्छे मानक बने और उनकी भाषाएँ धडल्लेसे संगणक व महाजालपर स्थान बनाने लगीं। भारतीय भाषाओंकी एकात्मता को भी और मजबूत करने की संभावना बढ गई।

अंग्रेजीके लिये ASCII की जगह एक नया मानक युनीकोड विकसित होने लगा। साथही एक नई ऑपरेटिंग सिस्टम लीनक्स सर्वमान्य होने लगी जिसका फलसफा यह था कि संगणकसे संबंधित सभी बुनियादी और सरल सॉफ्टवेअर सबको अनिर्बंध उपलब्ध कराओ ताकि सबका सम्मिलित लाभ हो सके। इसी कडीमें उन्होंने एक तरफ युनीकोड स्टॅण्डर्ड अपनाया तो साथमें भारतीय भाषाओंके कुंजीपटलके लिये इन्स्क्रिप्ट की-लेआउट भी। लेकिन जो जागतिक युनीकोड कन्सॉर्शियम युनीकोड मानक बना रहा था और जिसमें कुछ भारतीय, कुछ राजभाषा विभाग और सी-डॅकके अफसर भी थे, वहाँ चूक हो गई। जो मानक उन्होंने स्वीकार किया वह जागतिक होनेके कारण महाजालकी सुविधा तो आ गई और इन्स्क्रिप्ट लेआउट अपनानेसे टायपिंगमें सरलता भी आ गई पर इनके साथ एक परन्तु भी बीचमें आ गया। सोलह इकाइयोंवाली श्रृंखला के कारण जो कई गुना अधिक जगह मिल रही थी उसका उपयोग भाषाई एकात्मता बढानेके लिये करनेकी बजाए उन्होंने उस जगहका बँटवारा कर दिया और कहा कि लो अब हर भारतीय भाषाको दूसरीके साथ तालमेल बनाये रखने की कोई जरूरत नही, प्रत्येकका अपना अपना अलग अस्तित्व होगा। इसका परिणाम एक वाक्यमें यों है कि अब संगणकके लिये मल्याली क बंगाली क से अलग होगा। इस कारण अब शबरी पर मल्याली लिपिमें लिखी गई लोककथा भी महाजालपर होगी और बंगालीमें लिखी लोककथा भी होगी लेकिन बंगालीमें सर्च-कमांड देनेपर संगणक मल्याली लोककथा को नही खोज सकेगा। इस तरह हमारी सांस्कृतिक विरासतकी एकात्मता धीरे धीरे समाप्त होती चली जायगी।

मैं यह आरोप नही लगा रही कि इन बातोंके पीछे कोई सोची समझी चाल है। लेकिन मेरा यह मानना है कि हमारे अंदर एक किस्मकी लापरवाही है और अदूरदर्शिताभी। यही जागतिक युनीकोड कन्सॉर्शियम है कि जब उसने चीनी-जपानी-कोरियाई लिपियोंकी एकात्मता बरकरार रखनेके प्रयास नही किये तो उन देशोंने अपने राजकीय मतभेद और स्पर्धा भुलाकर आपसी समझौतेसे एक मानक बनाया और युनीकोड कन्सॉर्शियमको खबरदार किया कि तुम्हे यही मानक अपनाना होगा जो हमने अपने लिया चुना है। यही तेवर और ललक यदि भारतीयोंने नही दिखाई है तो इसका एक ही अर्थ है कि हम कभी अपनी एकात्मताके प्रति सजग और अभिमानी थे ही नही। और आज उसे बिखेरनेमें सहायक बने रहेंगे।
क्या अब भी हम सजग नही होंगे ?

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Monday, May 1, 2017

Language disconnects need bridging:

From: jitendra <jituviju@gmail.com>
Date: Tue, Mar 17, 2009 at 9:33 PM
Subject: Re: can you convene this meeting on 19march 4pm in your office, as suggested?
To: Vinay Dharmadhikari <vinay2000@gmail.com>
Cc: Leena Mehendale <leena.mehendale@gmail.com>, "Dr. Pushpak Bhattacharyya" <pushpakbh@gmail.com>, swarnalata@mit.gov.intdil@mit.gov.in, Ashok Saraf <saraf.ashok@gmail.com>, Anupam Saraph <anupamsaraph@gmail.com>


Dear Vinay,
I feel there is a need for a more organised meeting.
A discussion on emails should precede the meeting.

The biggest opportunity has been opened by the fact that NONE other than the Language department of the Government has taken the initiative. Credit goes to the Champion of the cause, Madam Leena Mehendale.
I wish to put forward my personal views , admittedly biased , for whatever they are worth. They are not very organised but hope to begin somewhere to evole into a coherent  perspective
Objective: Building a perspective and then draw an action plan for boosting Marathi on Computer/Internet
Who should attend: I  feel that attendees should include people active in language technology and/or decision makers in governments concerned with language technology.Users and cheer leaders may express their strong views on the email . And those who are not active on the email may take a back seat for the moment.
State Govt must take initiative:The state government is the right seat for such a meeting . Central Government has been urging the state governments to take active interest.

Some disconnects need bridging:
  1. Language Vs Technology: There is often a disconnect between language people ( those who are masters of linguistic delicacies and have an emotional bond for the language) and those who deal with IT/software (content developers who use IT tools, software application developers who need to incorporate indic languages, eGovernance application agencies who have a mandate to reach out to non-english masses). An intersection set of the two is what can actually do the job. The recent meeting (30th January) was a very welcome bridge of this sort.
  2. State Vs central: There is another disconnect: state governments and central government agencies.
    1. While Central Government has huge funds, it is not clear what their policy is.
    2. In the name of standardisation for egovernance, I have seen some ploicy initiatives , but do not know how much will land on the ground.
    3. the initiative from state governments is poor. It gets lost in the din of IT equipment purchase or big-ticket egovernance projects. 
    4. The situation in different states differs. It will be an adventure to pass cursory remarks. But , hazarding a thumbnail sketch, even if it is to provoke some violent reaction, is only to draw attention to what needs to be done for Marathi. There is no doubt that southern states (TamilNadu, Kerala and to some extent Karnatak and AP) have , as state governments taken major initiatives and taken decisions,actions and have , as a result achieved a lot of IT enablement of the language. Northern states , covered by Hindi have been blessed by major projects of the Central Government as also have been the focus of commercial organisations. As a result , some of the languages have gathered the critical mass and developments are happening. So a critical mass has to be gathered to shore up Marathi on Computer.
    5. But Marathi, Guarati, Oriya, (Bengali ?) etc have been languishing without the critical mass. 
    6. A meeting of officials across the state and central governments may create an alternative mechanism for giving momentum to the marathi technology development
  3. Can C-DAC be involved in perspective building:  It is not possible to blame C-DAC alone for failures in bringing all languages on computer. This is so  particularly in the absence of direction of the state government. But I hope i am wrong in my assessment of C-DAC. Due to close familiarity I may be missing the wood for the trees. Moreover , ironically,my  views about the role of the organisation are directly inverse of my sincere  respect for the individuals therein. Yet I feel C-DAC has failed in delivering over the last decade while  it had done so in the previous decade. The ISCII, inscript and fonts and basic infrastructure along with ISM and LEAP etc were pioneering service to the people of India. But this success and consequent complacency and monopoly was a cause of its failure. Then came the era of commercialisation. Then service to people was secondary. Hence the resistance to standardisation . Look at the CDs produced for all languages. Even today , the fonts and software distributed by C-DAC have no clear (public) license.Thus having acquired a role of vendor in the market, if we desire to work on a non-commercial pro-people perspective, it may be logical that C-DAC be kept at an arm's length from perspective building. 
  4. Targets: Use of Marathi on computers must perade into education(90% 0f students learn or are comfortable in marathi/indian languages in the state), governance ( government function and interface of egovernance), court work , content generation of all types.  
  5. Which technologies: Language Technology Group of e_governance standards has ably put together a comprehensive list of aspects of language technologes .We may be able to take that classification and place concerns of marathi within that . It is possible to bring all individual experiences and painpoints to the table but my feeling is all such concerns can be best handled in a structured manner.(see attached minutes of the working gropu meeting). I have no intention to suggest accepting any recommendations in the minutes attached. Only suggestion is to take the help  of classification implicit.
Hope these suggestions are seen only as positive.
Please reject any thing you feel is negative. I have no intention on arguing to defend my views.
Let us concentrate on the positive.
Hope there is a force of the community , supported by the government to salvage indian languages and hope marathi can lead the way hereafter

jitendra